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तपस्या में सर्वश्रेष्ठ हैं आचार्यश्री विद्यासागरजी

विद्यासागरजी में अपने शिष्यों का संवर्धन करने का अभूतपूर्व सामर्थ्य है। उनका बाह्य व्यक्तित्व सरल, सहज, मनोरम है किंतु अंतरंग तपस्या में वे वज्र-से कठोर साधक हैं। रात्रि में वे लकड़ी के पाटे पर विश्राम करते हैं और ठंड में भी रात्रि में कुछ भी नहीं ओढ़ते हैं। कन्नड़ भाषी होते हुए भी विद्यासागरजी ने हिन्दी, संस्कृत, कन्नड़, प्राकृत, बंगला और अंग्रेजी में लेखन किया है। आपने अनेक ग्रंथों का स्वयं ही पद्यानुवाद किया है।

आपके द्वारा रचित संसार में सर्वाधिक चर्चित काव्य प्रतिभा की चरम प्रस्तुति है- ‘मूक माटी’ महाकाव्य जिसके ऊपर ‘मूक माटी’ मीमांसा (भाग 1, 2, 3) पर लगभग 283 हिन्दी विद्वानों ने समीक्षाएं लिखी हैं, जो भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुकी हैं। इस पर 4 डीलिट, 50 पीएचडी, 8 एमफिल, 2 एमएड तथा 6 एमए आदि हो चुके हैं।

‘मूक माटी’ के मराठी, अंग्रेजी, बंगला, कन्नड़, गुजराती, उर्दू, संस्कृत व ब्राम्ही लिपि आदि में अनुवाद हुए हैं और हो रहे हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा रामटेक में 22 सितंबर 2017 को ‘मूक माटी’ के उर्दू अनुवाद का विमोचन हुआ था। पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा 14 जून 2012 को राष्ट्रपति भवन में ‘द साइलेंट अर्थ’ ‘मूक माटी’ के अंग्रेजी अनुवाद का विमोचन हुआ था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भोपाल में ‘मूक माटी’ के 14 अक्टूबर 2016 को भोपाल में गुजराती अनुवाद का विमोचन हुआ था।